सीधे मुख्य सामग्री पर जाएं

शिक्षा, समाज, साहित्य और बच्चा : समग्रता में देखने के लिए स्वस्थ नज़रिए की ज़रूरत【4 नवम्बर 2023, दैनिक क्रांतिकारी संकेत में प्रकाशित आलेख】

 


■समाज की नज़र से बच्चों को देखने का नज़रिया कितना सही

■हिंदी कहानियों के जरिये एक जरुरी विमर्श की कोशिश

---------------------------------------------------------------------

समाज की नजर में बच्चा कौन है ? उसे कैसा होना चाहिए ?जब इस तरह के सवालों पर बहुत गहराई में जाकर हमारा ध्यान केन्द्रित होता है तो इसका जवाब बहुत आसानी से हमें नहीं मिलता । सीधे तौर पर तो कतई नहीं कि हम किसी किताब में इसका कोई बना बनाया जवाब ढूँढ लें । आम तौर पर बच्चे की प्रतिछवि आम लोगों के मनो मष्तिष्क में जन्म से लेकर चौदह साल तक की छोटी उम्र से अंतर्संबंधित होकर ही बनती है । इसका अर्थ यह हुआ कि बच्चे का सम्बन्ध सीधे सीधे उसकी छोटी उम्र से होता है । यह धारणा आदिकाल से पुष्ट होती चली भी आ रही है । "समाज की नजर में बच्चा" को लेकर मेरा यह जो विमर्श है दरअसल आदिकाल से चली आ रही इसी धारणा को जीवन की कसौटी पर परीक्षण किए जाने के इर्द गिर्द ही केन्द्रित है । इस परीक्षण की प्रविधियां क्या हों? कि इसे  बेहतर तरीके से समझा जा सके, यह भी एक गम्भीर प्रश्न है जो हमारे साथ साथ चलता है । इस सवाल का जवाब कुछ हद तक हिंदी कहानियों में ढूंढा जा सकता है। चूंकि साहित्यिक कहानियां , साहित्य केन्द्रित सिनेमा आदि ,मनुष्य जीवन को कई सिरे से समझने बूझने की दृष्टि प्रदान करती हैं इसलिए साहित्य के माध्यम से जीवन को देखने समझने का नजरिया भी अपने आप में हमें एक बहुआयामी दिशा की ओर ले जाता है।

कोई बच्चा हमें संस्कारी लगता है , तो कोई बच्चा अपराध की शरण में जाने का हमें आभास कराता है , कोई बच्चा अपने बचपन को भलीभांति जीता है तो किसी बच्चे के जीवन में बचपन अदृश्य सा जान पड़ता है , जीवन की संघर्षमय और प्रतिकूल परिस्थितियाँ उसे समय से पहले ही वयस्क बना देती हैं । कोई बच्चा पढने में तेज जान पड़ता है तो कोई इस रेस में पिछड़ा हुआ दीखता है । इन सबके पीछे ऐसे कौन से कारण हैं जिसे समाज कभी समझने की चेष्टा नहीं करता और बच्चा और बचपन को लेकर अपनी बनी बनायी धारणा पर ही कायम रहता है।

बच्चों के ऊपर लिखी गई कतिपय हिन्दी कहानियाँ कुछ हद तक इन सवालों का जवाब ढूँढने में हमारी सहायता करती हैं । बच्चे के जन्म के बाद उसका सामना उसके परिवार से होता है जो कि समाज की इकाई है । उस परिवार के परिवेश से उसकी अन्तः क्रिया आरम्भ होकर धीरे धीरे उसके आस पड़ोस से होते हुए आगे जाकर बृहद समाज से अंतर्संबंधित होती है । बच्चे के जीवन में समाजीकरण की यह  घटना ही उसके अन्तः और बाह्य रूपाकार गढती है । बच्चे के समाजीकरण में जो प्रवृत्तियाँ कारक होती हैं लगभग वैसी ही प्रवृत्तियों को बच्चा ग्रहण करता है । उसके संस्कारी होने या अपराधी बनने में उसका समाजीकरण बड़ी भूमिका अदा करता है । शायद इसलिए माँ बाप अपने बच्चों को अच्छी संगति करने पर जोर देते हुए दिखाई देते हैं । माँ बाप द्वारा अपने बच्चों को दी गई ऎसी सलाहियत यद्यपि सतही लगती हैं क्योंकि ये सिर्फ अपने बच्चों तक ही सीमित होकर रह जाती हैं और उनमें एक सामूहिक प्रेरणा का भाव नहीं झलकता । इसका अर्थ ये कि समाज इन बातों के प्रति उदासीन रहते हुए बहुत सी बातें अपने स्तर पर निर्धारित कर लेता है और बच्चों के भाग्य से उसे जोड़ देता है कि फलां बच्चे को संस्कारी बनना था इसलिए वह संस्कारी बन गया और फलां बच्चे को अपराधी बनना था इसलिए वह अपराधी बन गया । ये बातें सच के करीब नहीं लगतीं । इन बातों में माता पिता ,परिवार , आस पड़ोस और बृहद समाज की भूलें परिलक्षित होती हैं जिस पर विचार किया जाना आवश्यक है । समाज में यह धारणा भी बहुत घर कर चुकी है कि संपन्न और अच्छे कहे जाने वाले परिवारों के बच्चे अच्छे और संस्कारी बनते हैं जबकि स्लम बस्ती के बच्चे आम तौर पर अपराधिक प्रवृत्ति के होते हैं । इन धारणाओं का कभी भी सामान्यीकरण नहीं किया जा सकता । ऎसी धारणाएं समाज में चली आ रही भूलों को उजागर करती हैं और उसे कटघरे में भी खड़ा करती हैं । इन धारणाओं की पड़ताल करती हिन्दी कहानियां बच्चे को समझने का एक बड़ा अवसर हमें देती हैं ।जयशंकर प्रसाद की कहानी छोटा जादूगर की चर्चा करें तो छोटा जादूगर के रूप में एक ऐसे बालक से हमारा सामना होता है जिसका जीवन विसंगतियों से भरा हुआ है, इसके बावजूद जीवन मूल्यों को साथ लिए वह सतत संघर्ष कर रहा है । एक तरफ देशप्रेम के लिए उसके पिता जेल में बंद हैं तो दूसरी तरफ उसकी माँ घर में बीमार है और खाट पर पड़ी पड़ी अपने आखरी दिनों की प्रतीक्षा में है । उस घर में कमाने वाला कोई नहीं है । पारिवारिक विपन्नता ने उस बच्चे को समय से पहले ही जिम्मेदार और व्यस्क बना दिया है जो अपने खिलौनों से जादू जैसा खेल दिखाकर दो पैसे जुटाता है जिससे माँ की दवाईयां और घर के खर्च का प्रबंध होता है।किसी बच्चे का समय से पहले ही व्यस्क हो जाना, जो कि अमूर्त होता है, समाज उसे कई बार देख नहीं पाता। समाज को लगता है कि बच्चों को  इस तरह के कामों में संलग्न नहीं होना चाहिए जो कि उसके बचपन को अधिक्रमित करते हैं । दरअसल जयशंकर प्रसाद छोटा जादूगर कहानी में समाज के उसी नजरिये पर ही प्रहार करते हैं जिसका नजरिया एकांगी है , जो बच्चों से यह तो चाहता है कि उसका बचपना उसकी गतिविधियों में बरकरार रहे पर समाज अपनी जिम्मेदारियों को या तो देख नहीं पाता या फिर उसे देखना ही नहीं चाहता।

बच्चा अपने परिवार , अपने आसपडोस से उपजी परिस्थितियों से जो अनुभव ग्रहण करता है, वही अनुभव उसे बच्चा बनाए रख सकता है ,वही अनुभव उसे समय से पहले वयस्क भी बना देता है। सवाल यह उठाया जा सकता है कि साहित्यिक कहानियों में प्रतिकूल परिस्थितियों के साथ एक संघर्षशील बच्चे को ही परिपक्व होता हुआ क्यों दिखाया जाता है ? क्या समस्त अनुकूल परिस्थितियों के होते कोई बच्चा मानसिक और वैचारिक स्तर पर परिपक्व नहीं हो सकता ? शायद इसका जवाब भी हिन्दी की साहित्यिक कहानियों से ही निकलकर आता  है । दरअसल जीवन का प्रतिकूल संघर्ष बच्चे के बचपन को अधिक्रमित करता है और उसे वह अनुभव देता है जो किसी अनुकूल परिस्थिति वाले बच्चे को नहीं मिल पाता । चूँकि अनुभव ही जीवन में सबसे बड़ा गुरू होता है , वही बच्चे को बच्चा रहने देता है तो वही बच्चे को छोटी उम्र में ही वयस्क और जिम्मेदार बना देता है जैसा कि जयशंकर प्रसाद की कहानी छोटा जादूगर में अपने अनुभव से वयस्क होते बच्चे को हम देखते हैं ।भीष्म साहनी की कहानी गुलेलबाज लडका में हम एक ऐसे बच्चे को देखते हैं जो साधारण श्रमिक परिवार से है और अपनी सामान्य गतिविधियों से अपराधिक और हिंसक होने का आभास देता है । वही लडका अनुकूल परिस्थितियों की संगति के साथ अपनी इस हिंसक छवि को स्वयं तोड़ता भी है । बाज से मैना के बच्चों  की सुरक्षा करते हुए उसके भीतर छुपी हुई संवेदना एकाएक हमें दिखाई देने लगती है । दरअसल समाज को इसी नजरिये को विकसित करने की आवश्यकता है जिसके जरिये किसी बच्चे की भीतरी दुनियां को ठीक ढंग से देखा जा सके । गहन संवेदना हर बच्चे में होती है , कई बार उदय प्रकाश की नेलकटर जैसी कहानी में अपनी माँ को खोते हुए बच्चे के भीतर सघन रूप में गठित होते हुए हम उस संवेदना को महसूस कर सकते हैं।उस संवेदना को देखे जाने और उसे बचाए जाने के प्रति जो एक गहन  उदासीनता है , वह जैनेन्द्र कुमार की कहानी अपना अपना भाग्य में लक्षित की जा सकती है। समाज की ओर से किसी बच्चे को उसके भाग्य के साथ जोडकर देखना भी अपनी जिम्मेदारियों से जी चुराने जैसा है । यह प्रवृत्ति सघन रूप में समाज में पसरी हुई भी दिखाई देती है जो किसी बच्चे को समग्र रूप में देखे समझे जाने में बहुत बाधक भी है।

आज जरूरत है कि समाज किसी बच्चे को उसकी समस्त अनुकूल और प्रतिकूल परिस्थितियों के साथ देखे-समझे और फिर कोई धारणा विकसित करे । कोई सुव्यवस्थित , सुविकसित और उपयुक्त धारणा ही बच्चों के बचपन को बचाए जाने के प्रति किसी ठोस पहल का आरम्भिक बिंदु है । ऎसी सुव्यवस्थित , सुविकसित धारणाएं समाज हिन्दी साहित्य की कहानियों और फिल्मों के माध्यम से ग्रहण कर सकता है । इनका प्रयोग शिक्षा के क्षेत्र में भी एक बड़े बदलाव का माध्यम बन सकता है । यह तथ्य कुछ हद तक सत्य है कि बच्चे के जीन्स में वंशानुगत रूप से कुछ चीजें प्रवाहमान होती हैं जिसके कारण वह अपने अल्प या कुशाग्र बुद्धि के होने का आभास कराता है पर ऐसे तथ्यों को भी बच्चे की उचित अन्तः क्रिया और समाजीकरण से झुठलाया जा सकता है । बच्चों को लेकर समाज में यह विमर्श सतत चलते रहना भी चाहिए ताकि बच्चों को लेकर बनी बनाई खांचों में गढ़ी गई पारम्परिक धारणाएं टूटें और कुछ नई बातों को बच्चों के जीवन से जोड़ा जा सके।

रमेश शर्मा, 92 श्रीकुंज, रायगढ़ छ. ग.

टिप्पणियाँ

इन्हें भी पढ़ते चलें...

कौन हैं ओमा द अक और इनदिनों क्यों चर्चा में हैं।

आज अनुग्रह के पाठकों से हम ऐसे शख्स का परिचय कराने जा रहे हैं जो इन दिनों देश के बुद्धिजीवियों के बीच खासा चर्चे में हैं। आखिर उनकी चर्चा क्यों हो रही है इसको जानने के लिए इस आलेख को पढ़ा जाना जरूरी है। किताब: महंगी कविता, कीमत पच्चीस हजार रूपये  आध्यात्मिक विचारक ओमा द अक् का जन्म भारत की आध्यात्मिक राजधानी काशी में हुआ। महिलाओं सा चेहरा और महिलाओं जैसी आवाज के कारण इनको सुनते हुए या देखते हुए भ्रम होता है जबकि वे एक पुरुष संत हैं । ये शुरू से ही क्रान्तिकारी विचारधारा के रहे हैं । अपने बचपन से ही शास्त्रों और पुराणों का अध्ययन प्रारम्भ करने वाले ओमा द अक विज्ञान और ज्योतिष में भी गहन रुचि रखते हैं। इन्हें पारम्परिक शिक्षा पद्धति (स्कूली शिक्षा) में कभी भी रुचि नहीं रही ।  इन्होंने बी. ए. प्रथम वर्ष उत्तीर्ण करने के पश्चात ही पढ़ाई छोड़ दी किन्तु उनका पढ़ना-लिखना कभी नहीं छूटा। वे हज़ारों कविताएँ, सैकड़ों लेख, कुछ कहानियाँ और नाटक भी लिख चुके हैं। हिन्दी और उर्दू में  उनकी लिखी अनेक रचनाएँ  हैं जिनमें से कुछ एक देश-विदेश की कई प्रतिष्ठित पत्रिकाओं में प्रकाशित हो चुक...

परदेशी राम वर्मा की कहानी दोगला

परदेशी राम वर्मा की कहानी दोगला वागर्थ के फरवरी 2024 अंक में है। कहानी विभिन्न स्तरों पर जाति धर्म सम्प्रदाय जैसे ज्वलन्त मुद्दों को लेकर सामने आती है।  पालतू कुत्ते झब्बू के बहाने एक नास्टेल्जिक आदमी के भीतर सामाजिक रूढ़ियों की जड़ता और दम्भ उफान पर होते हैं,उसका चित्रण जिस तरह कहानी में आता है वह ध्यान खींचता है। दरअसल मनुष्य के इसी दम्भ और अहंकार को उदघाटित करने की ओर यह कहानी गतिमान होती हुई प्रतीत होती है। पालतू पेट्स झब्बू और पुत्र सोनू के जीवन में घटित प्रेम और शारीरिक जरूरतों से जुड़ी घटनाओं की तुलना के बहाने कहानी एक बड़े सामाजिक विमर्श की ओर आगे बढ़ती है। पेट्स झब्बू के जीवन से जुड़ी घटनाओं के उपरांत जब अपने पुत्र सोनू के जीवन से जुड़े प्रेम प्रसंग की घटना उसकी आँखों के सामने घटित होते हैं तब उसके भीतर की सामाजिक जड़ता एवं दम्भ भरभरा कर बिखर जाते हैं। जाति, समाज, धर्म जैसे मुद्दे आदमी को झूठे दम्भ से जकड़े रहते हैं। इनकी बंधी बंधाई दीवारों को जो लांघता है वह समाज की नज़र में दोगला होने लगता है। जाति धर्म की रूढ़ियों में जकड़ा समाज मनुष्य को दम्भी और अहंकारी भी बनाता है। कहानी इन दीवा...

रघुनंदन त्रिवेदी की कहानी : हम दोनों

स्व.रघुनंदन त्रिवेदी मेरे प्रिय कथाकाराें में से एक रहे हैं ! आज 17 जनवरी उनका जन्म दिवस है।  आम जन जीवन की व्यथा और मन की बारिकियाें काे अपनी कहानियाें में मौलिक ढंग से व्यक्त करने में वे सिद्धहस्त थे। कम उम्र में उनका जाना हिंदी के पाठकों को अखरता है। बहुत पहले कथादेश में उनकी काेई कहानी पढी थी जिसकी धुंधली सी याद मन में है ! आदमी काे अपनी चीजाें से ज्यादा दूसराें की चीजें  अधिक पसंद आती हैं और आदमी का मन खिन्न हाेते रहता है ! आदमी घर बनाता है पर उसे दूसराें के घर अधिक पसंद आते हैं और अपने घर में उसे कमियां नजर आने लगती हैं ! आदमी शादी करता है पर किसी खूबसूरत औरत काे देखकर अपनी पत्नी में उसे कमियां नजर आने लगती हैं ! इस तरह की अनेक मानवीय मन की कमजाेरियाें काे बेहद संजीदा ढंग से कहानीकार पाठकाें के सामने प्रस्तुत करते हैं ! मनुष्य अपने आप से कभी संतुष्ट नहीं रहता, उसे हमेशा लगता है कि दुनियां थाेडी इधर से उधर हाेती ताे कितना अच्छा हाेता !आए दिन लाेग ऐसी मन: स्थितियाें से गुजर रहे हैं , कहानियां भी लाेगाें काे राह दिखाने का काम करती हैं अगर ठीक ढंग से उन पर हम अपना ध्यान केन्...

डॉक्टर परिधि शर्मा की कहानी - ख़त

  शिवना नवलेखन पुरस्कार 2024 अंतर्गत डॉक्टर परिधि शर्मा के कहानी संग्रह 'प्रेम के देश में' की पाण्डुलिपि अनुसंशित हुई है। इस किताब का विमोचन फरवरी 2025 के नयी दिल्ली विश्व पुस्तक मेले में शिवना प्रकाशन के स्टाल पर  किया जाएगा । यहाँ प्रस्तुत है उनकी कहानी  'ख़त' कहानी:    ख़त डॉ . परिधि शर्मा _______________ रात की सिहरन के बाद की उदासी ठंडे फर्श पर बूंद बनकर ढुलक रही थी। रात के ख़त के बाद अब कोई बात नहीं बची थी। खुद को संभालने का साहस भी मात्र थोड़ा-सा बच गया था। ख़त जिसमें मन की सारी बातें लिखी गईं थीं। सारा आक्रोश , सारे जज़्बात , सारी भड़ास , सारी की सारी बातें जो कही जानी थीं , पूरे दम से आवेग के साथ उड़ेल दी गईं थीं। ख़त जिसे किसी को भी भेजा नहीं जाना था। ख़त जिसे किसी को भेजने के लिए लिखा गया था। कुछ ख़त कभी किसी को भेजे नहीं जाते बस भेजे जाने के नाम पर लिखे जाते हैं। खिड़की के कांच के उस ओर खुली हवा थी। हवा के ऊपर आकाश। पेड़ पौधे सबकुछ। आजादी। प्रेम में विफल हो जाने के बाद की आजादी की तरह। खिड़की के पास बैठे हुए आकाश कांच के पार से उतना नंगा नहीं...

30 अक्टूबर पुण्यतिथि पर डॉ राजू पांडे को याद कर रहे हैं बसंत राघव "सत्यान्वेषी राजू पांडेय के नहीं होने का मतलब"

डॉक्टर राजू पांडेय शेम शेम मीडिया, बिकाऊ मीडिया, नचनिया मीडिया,छी मीडिया, गोदी मीडिया  इत्यादि इत्यादि विशेषणों से संबोधित होने वाली मीडिया को लेकर चारों तरफ एक शोर है , लेकिन यह वाकया पूरी तरह सच है ऐसा कहना भी उचित नहीं लगता ।  मुकेश भारद्वाज जनसत्ता, राजीव रंजन श्रीवास्तव देशबन्धु , सुनील कुमार दैनिक छत्तीसगढ़ ,सुभाष राय जनसंदेश टाइम्स जैसे नामी गिरामी संपादक भी आज मौजूद हैं जो राजू पांंडेय को प्रमुखता से बतौर कॉलमिस्ट अपने अखबारों में जगह देते रहे हैं। उनकी पत्रकारिता जन सरोकारिता और निष्पक्षता से परिपूर्ण रही है।  आज धर्म  अफीम की तरह बाँटी जा रही है। मेन मुद्दों से आम जनता का ध्यान हटाकर, उसे मशीनीकृत किया जा रहा है। वर्तमान परिपेक्ष्य में राजनीतिक अधिकारों, नागरिक आजादी और न्यायपालिका की स्वतंत्रता के क्षेत्र में गिरावट महसूस की जा रही है। राजू पांंडेय का मानना था कि " आज तंत्र डेमोक्रेसी  इलेक्टोरल ऑटोक्रेसी में तब्दील हो चुकी है ,जहां असहमति और आलोचना को बर्दाश्त नहीं किया जाता और इसे राष्ट्र विरोधी गतिविधि की संज्ञा दी जाती है।" स्थिति इतनी भयावह हो गई ...

जैनेंद्र कुमार की कहानी 'अपना अपना भाग्य' और मन में आते जाते कुछ सवाल

कहानी 'अपना अपना भाग्य' की कसौटी पर समाज का चरित्र कितना खरा उतरता है इस विमर्श के पहले जैनेंद्र कुमार की कहानी अपना अपना भाग्य पढ़ते हुए कहानी में वर्णित भौगोलिक और मौसमी परिस्थितियों के जीवंत दृश्य कहानी से हमें जोड़ते हैं। यह जुड़ाव इसलिए घनीभूत होता है क्योंकि हमारी संवेदना उस कहानी से जुड़ती चली जाती है । पहाड़ी क्षेत्र में रात के दृश्य और कड़ाके की ठंड के बीच एक बेघर बच्चे का शहर में भटकना पाठकों के भीतर की संवेदना को अनायास कुरेदने लगता है। कहानी अपने साथ कई सवाल छोड़ती हुई चलती है फिर भी जैनेंद्र कुमार ने इन दृश्यों, घटनाओं के माध्यम से कहानी के प्रवाह को गति प्रदान करने में कहानी कला का बखूबी उपयोग किया है। कहानीकार जैनेंद्र कुमार  अभावग्रस्तता , पारिवारिक गरीबी और उस गरीबी की वजह से माता पिता के बीच उपजी बिषमताओं को करीब से देखा समझा हुआ एक स्वाभिमानी और इमानदार गरीब लड़का जो घर से कुछ काम की तलाश में शहर भाग आता है और समाज के संपन्न वर्ग की नृशंस उदासीनता झेलते हुए अंततः रात की जानलेवा सर्दी से ठिठुर कर इस दुनिया से विदा हो जाता है । संपन्न समाज ऎसी घटनाओं को भाग्य से ज...

समकालीन कविता और युवा कवयित्री ममता जयंत की कविताएं

समकालीन कविता और युवा कवयित्री ममता जयंत की कविताएं दिल्ली निवासी ममता जयंत लंबे समय से कविताएं लिख रही हैं। उनकी कविताओं को पढ़ते हुए यह बात कही जा सकती है कि उनकी कविताओं में विचार अपनी जगह पहले बनाते हैं फिर कविता के लिए जरूरी विभिन्न कलाएं, जिनमें भाषा, बिम्ब और शिल्प शामिल हैं, धीरे-धीरे जगह तलाशती हुईं कविताओं के साथ जुड़ती जाती हैं। यह शायद इसलिए भी है कि वे पेशे से अध्यापिका हैं और बच्चों से रोज का उनका वैचारिक संवाद है। यह कहा जाए कि बच्चों की इस संगत में हर दिन जीवन के किसी न किसी कटु यथार्थ से वे टकराती हैं तो यह कोई अतिशयोक्ति भरा कथन नहीं है। जीवन के यथार्थ से यह टकराहट कई बार किसी कवि को भीतर से रूखा बनाकर भाषिक रूप में आक्रोशित भी कर सकता है । ममता जयंत की कविताओं में इस आक्रोश को जगह-जगह उभरते हुए महसूसा जा सकता है। यह बात ध्यातव्य है कि इस आक्रोश में एक तरलता और मुलायमियत है। इसमें कहीं हिंसा का भाव नहीं है बल्कि उद्दात्त मानवीय संवेदना के भाव की पीड़ा को यह आक्रोश सामने रखता है । नीचे कविता की कुछ पंक्तियों को देखिए, ये पंक्तियाँ उसी आक्रोश की संवाहक हैं - सोचना!  सो...

रायगढ़ के राजाओं का शिकारगाह उर्फ रानी महल raigarh ke rajaon ka shikargah urf ranimahal.

  रायगढ़ के चक्रधरनगर से लेकर बोईरदादर तक का समूचा इलाका आज से पचहत्तर अस्सी साल पहले घने जंगलों वाला इलाका था । इन दोनों इलाकों के मध्य रजवाड़े के समय कई तालाब हुआ करते थे । अमरैयां , बाग़ बगीचों की प्राकृतिक संपदा से दूर दूर तक समूचा इलाका समृद्ध था । घने जंगलों की वजह से पशु पक्षी और जंगली जानवरों की अधिकता भी उन दिनों की एक ख़ास विशेषता थी ।  आज रानी महल के नाम से जाना जाने वाला जीर्ण-शीर्ण भवन, जिसकी चर्चा आगे मैं करने जा रहा हूँ , वर्तमान में वह शासकीय कृषि महाविद्यालय रायगढ़ के निकट श्रीकुंज से इंदिरा विहार की ओर जाने वाली सड़क के किनारे एक मोड़ पर मौजूद है । यह भवन वर्तमान में जहाँ पर स्थित है वह समूचा क्षेत्र अब कृषि विज्ञान अनुसन्धान केंद्र के अधीन है । उसके आसपास कृषि महाविद्यालय और उससे सम्बद्ध बालिका हॉस्टल तथा बालक हॉस्टल भी स्थित हैं । यह समूचा इलाका एकदम हरा भरा है क्योंकि यहाँ कृषि अनुसंधान केंद्र के माध्यम से लगभग सौ एकड़ में धान एवं अन्य फसलों की खेती होती है।यहां के पुराने वासिंदे बताते हैं कि रानी महल वाला यह इलाका सत्तर अस्सी साल पहले एकदम घनघोर जंगल हुआ करता था ...

गंगाधर मेहेर : ओड़िया के लीजेंड कवि gangadhar meher : odiya ke legend kavi

हम हिन्दी में पढ़ने लिखने वाले ज्यादातर लोग हिंदी के अलावा अन्य भाषाओं के कवियों, रचनाकारों को बहुत कम जानते हैं या यह कहूँ कि बिलकुल नहीं जानते तो भी कोई अतिश्योक्ति नहीं होगी ।  इसका एहसास मुझे तब हुआ जब ओड़िसा राज्य के संबलपुर शहर में स्थित गंगाधर मेहेर विश्वविद्यालय में मुझे एक राष्ट्रीय संगोष्ठी में बतौर वक्ता वहां जाकर बोलने का अवसर मिला ।  2 और 3  मार्च 2019 को आयोजित इस दो दिवसीय संगोष्ठी में शामिल होने के बाद मुझे इस बात का एहसास हुआ कि जिस शख्श के नाम पर इस विश्वविद्यालय का नामकरण हुआ है वे ओड़िसा राज्य के ओड़िया भाषा के एक बहुत बड़े कवि हुए हैं और उन्होंने अपनी कविताओं के माध्यम से  ओड़िसा राज्य को देश के नक़्शे में थोड़ा और उभारा है। वहां जाते ही इस कवि को जानने समझने की आतुरता मेरे भीतर बहुत सघन होने लगी।वहां जाकर यूनिवर्सिटी के अध्यापकों से , वहां के विद्यार्थियों से गंगाधर मेहेर जैसे बड़े कवि की कविताओं और उनके व्यक्तित्व के बारे में जानकारी जुटाना मेरे लिए बहुत जिज्ञासा और दिलचस्पी का बिषय रहा है। आज ओड़िया भाषा के इस लीजेंड कवि पर अपनी बात रखते हुए मुझे जो खु...

अख़्तर आज़ाद की कहानी लकड़बग्घा और तरुण भटनागर की कहानी ज़ख्मेकुहन पर टिप्पणियाँ

जीवन में ऐसी परिस्थितियां भी आती होंगी कि जिसकी कल्पना नहीं की जा सकती। (हंस जुलाई 2023 अंक में अख्तर आजाद की कहानी लकड़बग्घा पढ़ने के बाद एक टिप्पणी) -------------------------------------- हंस जुलाई 2023 अंक में कहानी लकड़बग्घा पढ़कर एक बेचैनी सी महसूस होने लगी। लॉकडाउन में मजदूरों के हजारों किलोमीटर की त्रासदपूर्ण यात्रा की कहानियां फिर से तरोताजा हो गईं। दास्तान ए कमेटी के सामने जितने भी दर्द भरी कहानियां हैं, पीड़ित लोगों द्वारा सुनाई जा रही हैं। उन्हीं दर्द भरी कहानियों में से एक कहानी यहां दृश्यमान होती है। मजदूर,उसकी गर्भवती पत्नी,पाँच साल और दो साल के दो बच्चे और उन सबकी एक हजार किलोमीटर की पैदल यात्रा। कहानी की बुनावट इन्हीं पात्रों के इर्दगिर्द है। शुरुआत की उनकी यात्रा तो कुछ ठीक-ठाक चलती है। दोनों पति पत्नी एक एक बच्चे को अपनी पीठ पर लादे चल पड़ते हैं पर धीरे-धीरे परिस्थितियां इतनी भयावह होती जाती हैं कि गर्भवती पत्नी के लिए बच्चे का बोझ उठाकर आगे चलना बहुत कठिन हो जाता है। मजदूर अगर बड़े बच्चे का बोझ उठा भी ले तो उसकी पत्नी छोटे बच्चे का बोझ उठाकर चलने में पूरी तरह असमर्थ हो च...